Saturday, 29 March 2014

होली का रंग




होली के रंगों की तरह,
बदलती है ज़िंदगी रंग,
बदलते हैं आप रंग,
रंगो का अजूबा एक,
रंग में रंग मिला दो तो अलग ही रंग दिखेगा,
जैसे अबतक छल रहा था आपको,
ऐसे ही रंगों से बने हैं हम,
ऐसे ही रंग बदलते हैं हम,
बदलती है ये कुदरत भी अपने रंग,
कभी सुर्ख लाल, तो कभी गाढ़ा हरा,
कभी शुद्ध सफ़ेद तो कभी अंधेरे से काला,
जीतने रंग, उतने ही उनके मतलब,
हर मतलब में छुपी एक इच्छा, एक आशा,
एक कोशिश, एक दृढ़ता,
और उन रंगो से बने आप,
उन रंगो में ढले आप,
कभी उस रंग को खोजते भी हैं आप,
कभी उस रंग में रंगते हैं आप,
तो,
इन रंगों में रंगना सीखो,
इन रंगो में से अपना रंग पहचानो,
इन रंगों से अपनी पहचान को जानो,
और देखो कौन सा रंग है तुम्हारा,
और किस रंग में ढलना चाहते हो तुम 

Friday, 28 March 2014

यह सब ठीक है



दूर क्षितिज में टूटती सोने की थाल को देख,
मिट्टी के बने रास्ते पर छितराए हरी घास को देख,
ओस की बूंदों पर पड़ती सूरज की चमकीली रौशनी को देख,
और साथ ही कचनार के करीने से गिरे मीठे फूलों को देख,
जैसे कमबख्त ज़िंदगी भी अब तक बिलकुल कुछ ऐसी ही है,
टूटती, छितराती पर चमकीले करीने से बनने की कोशिश करती आई है।
पर न ही अबतक इस सोने की टूटती थाल को पेंदा ही मिल पाया है,
न ही उस छितराई हरीभरी घास को एक पगडंडी ही मिल पाई है,
उन ओस की बूंदों को भी अबतक सूरज की गर्मी का इंतज़ार है,
और कचनार के फूल अब भी अपनी मिठास भरी महक को बांधे हैं,
पर ये सब ठीक है, गलत नहीं है,
टूटना, छितराना, ठंडा रहना या की बंधा रहना,
क्योंकि शायद समय नहीं आया है।
शायद सूरज ठहरना नहीं चाहता और हरी घास को पगडंडी की हसरत नहीं,
क्योंकि बूंदों का स्वभाव भी ठंडा रहना ही है,
और कचनार अभी खिल ही रहा है।
तो यह सब ठीक है,
क्योंकि यही ज़िंदगी है। 

Friday, 11 October 2013

बैंड बाजा बारात





मेरे हाथों से अभी मेहंदी का रंग उतारा भी नहीं है और मैंने निश्चय किया कि मैं ये खास लेख लिखूँगी। नहीं, ये मेरी शादी की मेहंदी नहीं है और मैं इसकी शुक्रगुजार हूँ। यह मैं आपको अंत में बताऊँगी कि मैं शुक्रगुजार क्यों हूँ।
छ: महीने पहले कि बात है मेरी दोस्त का फोन आया “भैया की शादी है, तुम उस समय कहाँ रहोगी? भारत में या फिर इंग्लैंड में?”। मैंने बताया कि मैं उस समय भारत में ही रहूँगी और नहीं भी रही तो आ जाऊँगी। तो जुलाई में मेरा उसके घर जाना तय हुआ। मुझसे कई गुना तीव्रता के साथ मेरी दोस्त इस शादी की तैयारी करने लगी। स्वाभाविक भी है ये उसके घर की पहली शादी थी।
मैं पटना आई, कुछ दिन अपने गाँव में बिताया। बीच में हमारी कई बार बातचीत होती रहती। तैयारी कैसी चल रही है इस बारे में जानकारी विस्तार से आदान प्रदान होती। क्या खरीदा, किस रंग का खरीदा, कितने का खरीदा? तुम किस रंग का खरीदो इसके सुझाव भी मिलते।
समय बीता और जुलाई की एक प्यारी सुबह, तड़के ही छ: बजे की ट्रेन से मैं अपने मंज़िल की ओर चल पड़ी। रास्ते में झाल मूढ़ी खाते और चाय पीते मैं आधे रास्ते कब पहुंची पता ही नहीं चला। पारसनाथ स्टेशन आने पर मैंने दुबारा मेरी मित्र को फोन लगाया। और पूछा की  “भाई ये स्टेशन आ गया है अब कितनी देर है यहा से”। उसने कहा “ओह! तुम वहाँ पहुँच गई तब तो तुम हमारे यहाँ से ज़्यादा दूर नहीं हो बस कुछ घंटे, और तुम्हें पता है ये जगह जैनों का बड़ा प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है। काफी सारों ने यहाँ आकर मुक्ति पाई है इसलिए इस जगह का बड़ा नाम है”। जब मंज़िल पर पहुंची तब मेरी मित्र और होने वाली भाभी दोनों मुझे लेने आए थे। बड़ा अच्छा लगा। ज़्यादातर शादियों में दुल्हन का घर से निकलना तक दुश्वार रहता है। शादी की तैयारियों में हम इतने व्यस्त हो गए कि दो दिन तक हमें अगर साथ बिताने का समय मिला तो वो भी कार में। इसे उठाओ और उसे पहुंचाओ में ही सारा समय जाता। बीच बीच में हम बातें करते जाते और उसके बीच बीच में गालियाँ भी निकालते जाते “अरे गधे चलना नहीं आता है क्या?” या फिर “ देखो, उल्लू कैसे खड़ा है बीच सड़क पर, बेशरम”। मुझे याद आया पटना की ट्रेफिक भी ऐसी ही अविश्वासनीय है। कब, कौन कहाँ से उछलते हुये तुम्हारे सामने आ जाए बिलकुल अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता।
अगले दिन तिलक था वैसे ही जैसे हर शादी में होता है। तिलक देने के साथ दहेज देने की भी कुप्रथा है। बहुत से लोगों को आश्चर्य हुआ “अररे, arrange marriage में लड़के ने दहेज नहीं लिया, बड़ी अजीब बात है” लोगों को बात पची नहीं। वैसे भी चाहे प्रथा हो या कुप्रथा समाज में कुछ अलग होना लोगों को गंवारा नहीं होता। मैंने अपने बड़ों से पूछा “तिलक कि  कुछ खास बातें बताइये”। सकारात्मक बातें अगर बताई जाएँ तो ये कहा जा सकता है कि तिलक में शादी करने वाले जोड़े को जो अपनी नई ज़िंदगी साथ बिताने जा रहा हैं को माता पिता आशीर्वाद देते हैं और साथ ही कुछ ज़रूरत का समान और पैसे इत्यादि देते हैं। पर यही जब दहेज जैसी कुप्रथा में बदल जाए जहां लिंग (लड़के और लड़की) के नाम पर तो भेद होता ही है साथ ही पैसे को सबसे ऊपर रखा जाता है तब वो तिलक नामक प्रथा एक कुप्रथा बन जाती है। इस शादी में दहेज नामक प्रथा का घोर विरोध किया गया था।
संगीत का दिन भी बड़े मज़े में बीता दोनों ही परिवार संगीत में शामिल हुये और एक दूसरे को और जानने समझने कि कोशिश भी की। और तब आया शादी का दिन। मैं यहाँ आपको ये बता दूँ की ये पहली शादी थी जिसमें मैं शुरू से याने की तिलक के एक दिन पहले से सत्यनारायन पूजा के दिन तक सारा समय एक परिवार की तरह बिताया। सारी तैयारियों में पूरा सहयोग देने की कोशिश कि और सारी विधियों को गौर से देखा। कुछ अच्छी बातें थी तो कुछ निरर्थक, नाकाम और खर्चीली बेकाम की परम्पराएँ।
शादी का दिन बड़े मज़े का होता है। हमारे भाई की शादी है इसलिए हम खूब सजते धजते हैं। महंगे चमकीले और रंगबिरंगे कपड़े पहनते हैं। दुलहान 50 हज़ार का शादी का जोड़ा खरीदती है। गहनों का तो कपड़ों से ज़्यादा महंगा होना स्वाभाविक है। दुल्हन के 4 से 5 दिन VLCC नामक शृंगारगृह (Beauty parlor ) में अपने आप को सुंदर बनाने में बीतते हैं (बर्बाद होते हैं)। दूसरों की अपेक्षा रहती है की दुल्हन सुंदर दिखनी ही चाहिए। दुल्हन की खुद भी यही चाहत होती है की वो खूबसूरत दिखे। दुल्हन की सुंदरता से एक प्रश्न उठता है जो मेरे माता पिता बचपन से मुझे समझना चाहते थे और बौद्धिक स्तर पर थोड़ी बहुत समझ में भी आती थी। पर अब जाकर महसूस की। सोचा, ऐसा क्यों है की स्त्रियाँ पुरुषों से ज़्यादा सजती है, ज़्यादा जेवर पहनती है? आपने कभी सोचा है? मेरा खयाल है की समाज जिसमें पास पड़ोस, रिश्तेदार, दोस्त, फिल्में, और नौकरी सभी शामिल हैं का दबाव या की एक तरह की पुरुषों को प्रसन्न करने की मानसिक कमजोरी रहने के कारण इस तरह का व्यवहार रहता है। आप जैसे हैं वैसे ही रहना, कोई लेप कोई ऊपरी आवरण नहीं लगाना, दूसरे के सामने सुंदर दिखने की कोशिश न करना, आत्मविश्वास से आता है। सुंदरता के आपके मायने क्या हैं और जहां सारी दुनिया ही स्त्री को एक दुइयम दर्जे का मानती हों। न सिर्फ पुरुष बल्कि स्त्री खुद अपने को एक स्वतंत्र एकाई नहीं दूसरे पर का बोझ मानती हो तो वैसे वर्ण में आत्मविश्वास का कम होना स्वाभाविक है। इसे आप अपने ऊपर न लें। दुनिया में करोड़ों लोग हैं। वैसे ये तो आपके खुद के परखने की बात हैं, मैं क्या बोलूँ।
मुझे ये पता नहीं और जानने की इच्छा भी नहीं की गहने पहनने और साज शृंगार की प्रथा कब से और कहाँ शुरू हुई, उसका चिकित्सकीय फायदा क्या है। मुझे समझ में बस इतना आता है की यह एक बहाना है खुद की कमजोरियों को खूबसूरती की ढाल में छुपा लेने का। क्योंकि उनका सामना करना मुश्किल है और झुठला देना आसान। आप यह कह सकते हैं “ऐसा नहीं है, मैं ये खुद के लिए करती हूँ” या फिर ये “तुम नहीं करती हो क्या” या कि “ये पुरानी परंपरा है, हजारों साल की परंपरा गलत नहीं हो सकती” बल्कि कुछ लोगों ने तो ये भी कह दिया “इसके चिकित्सकीय फायदे है जब आप कान में छेद करते हैं तो वहाँ की नसों में अलग तरह का प्रभाव पड़ता” वगैरह – वगैरह। मुझे तो बस इतना दिखाई देता है कि मानव जाती के लिए ये क्या कम था की उन्होने गाय और बैलों के नाक कान छेदे, उनसे होड़ करने की हमें क्या ज़रूरत पड़ी। खैर इस होड़ में मैं भी शामिल हूँ। मेरे भी कान में मैंने एक हैदराबादी शाम को तय किया कि चलो हैदराबाद आई हूँ तो यहाँ से कान छिदवाकर ही वापस जाऊँगी। बस फर्क इतना था कि ये मानवी काम मैंने 22 साल की उम्र में किया और इसका फैसले में मेरे माता पिता का कोई हाथ नहीं था। मेरा ये भी खयाल है की इन सारी चीजों से व्यक्ति विशेष को कोई खास लाभ नहीं होता समय की बरबादी सो अलग और ये बात और पुष्ट होती है जब इस बात का एहसास हो कि करोड़ों लोग जहां न सिर्फ गहनों के अभाव में हैं बल्कि रोज़मर्रा की ज़रूरतों, ज़िंदगी में काम आने वाली चीजों का भी अभाव हो। वहाँ ये शर्मनाक है कि कुछ लोग ऐसे बेकाम की चीजों में अपना समय और अपनी काबीलीयत नष्ट कर रहे हैं। सारे साधनों का भरपूर मात्रा में उपयोग करते हुये भी बस वहीं तक सीमित हैं।     

किसी ने कहा है “सोने की ईटों को दरिया में फेंकना और स्त्रियॉं के लिए गहने बनवाना लगभग एक जैसी बातें हैं”। यहाँ लगभग शब्द का उपयोग इसलिए किया गया है क्योंकि गहनों को बेच कर आप कभी कभार उसका फायदा उठा सकते हैं।
शादी की रस्म शुरू होती है और लड़का मंडप में बैठा है लड़की के माता पिता मंडप में लड़के के सामने बैठे हैं और कन्यादान की खास विधि शुरू है। जैसा कि हर शादी में होता है। अभी कुछ ही दिन हुये कि मैंने सोचा था “कन्यादान” कितनी अजीब संज्ञा दी गई है इस रस्म को। मैंने सोचा सच इसके नाम जैसा ही इसका मतलब नहीं होगा। मैंने अपने परिवार के बड़ों से बात की। पता करने की कोशिश की कि जो मैं सोच रही हूँ वो गलत तो नहीं। पर मुझे थोड़ा सा आश्चर्य हुआ (थोड़ा इसलिए क्योंकि मैं यही अपेक्षा भी कर रही थी) कन्यादान जैसा नाम वैसी ही प्रथा भी है। यहाँ आप कन्या को दान में एक के पास से दूसरे परिवार को देते हैं। दान शब्द मैंने पहले भी सुना था जैसे की भूदान’ ‘ग्रामदान अथवा सिर्फ दान। बड़ी श्रध्दा थी इनके प्रति इनके पीछे के रचनात्मक काम के बारे में भी बड़ा विश्वास रहा है, पर दान शब्द का इतना ठोस और आहत करनेवाला रूप पहले ध्यान नहीं आया था, कितना अजीब है। समाज का एकदम पूरक रूप देखने को मिलता है। वही समाज जो दूसरों की मदत करने को इतना तत्पर रहता है की अपनी ज़मीन जैसी मूल्यवान चीज़ भी दान में देने को तैयार हो जाता है। एक संत के कहने पर अपना जीवन तक दान में दे देता है। वहीं दूसरी ओर अपने घर की बेटी को या अपने घर की बहू को एक स्वतंत्र एकाई न समझना एक वस्तु जैसा पेश करना और दान में दे देता है। थोड़े आश्चर्य के साथ बड़ा दुख होता है।
अररे! मैं एक खास, सबसे महत्वपूर्ण, सबकी मनपसंद और सबसे बेकाम की एक प्रथा के बारे में तो भूल ही गई थी। शादी की शुरुआत होती है बैंड, बाजा और बारात से। मेरे परिवार में इतनी सारी शादियाँ हुई हैं पर मैं काफी कम बरातों में शामिल हुई हूँ। शायद ये भी कारण है की अबतक इसकी निरर्थकता का आभास नहीं हुआ था।
पहाड़ी जगहों की गर्मी इतनी नहीं होती की परेशान कर दे इसलिए हम सब जश्न मना रहे थे। नाच गाना बैंड बाजे का शोर और खूब सारी रौशनी। अचानक उस रौशनी के ठीक नीचे जहां से अंधेरा शुरू होता है वहाँ मुझे कुछ जोड़ी आँखों की दिखाई दी। एक क्षण ऐसा लगा जैसे सारी आँखें मुझे ही घूर रही हों। उस चकाचौंध करदेने वाली रौशनी और कान फाडू बेसुरे बैंड और बाजे की आवाज़ में मेरा पहले ध्यान ही नहीं गया था। शायद आँखों को चमकाने वाली रोशनी में अंधेरे को देखना समझना मुमकिन नहीं होता। ठीक वैसे ही जैसे की दीये के ऊपर की रोशनी को दीये के नीचे का अंधेरा देखना मुमकिन नहीं हो पता। मेरे साथ भी यही हुआ।
जहां से रोशनी निकाल रही थी ठीक उसके नीचे के काले अंधेरे में खड़े छोटे कद की औरतें और बच्चों ने उन रोशनियों का बेड़ा उठाए हुये था। ललसाई सी आंखो से हमें देख रहे थे। मैं ठिठक गई (इसलिए भी की बारात आगे बढ्ने का नाम ही नहीं ले रही थी)। उन्हे ध्यान से देखा। छोटा कद, भूरा रंग, पसीने से लदी सादे कपड़ों में खड़ी जैसे मुझे उदासीनता की ओर ले जाने लगी। शर्म के तिलस्म में जादूगरनीयों की तरह फँसाने लगीं (बिलकुल हातिम ताई  के कहानी जैसी)। वे आँखें जैसे मुझे ही दया के भाव से देख रही हों। कह रही हों “ये क्या कर रही हो, चलो आओ, खड़ी क्या हो। देखो दुनिया सिर्फ मेरे सिर पर रखे, मेरे ही मेहनत के चकचौंद और चमक दमक का नतीजा नहीं है। इसकी सच्चाई मेरे साथ का अंधेरा भी है जो मेरे चारों ओर घना और घना होता जा रहा है। यह तिलस्म मेरा नहीं तुम्हारे कर्मों का फल है। ये काला जादू मुझे ही नहीं तुम्हें भी काला कर देगा। तुमपर हावी हो उसके पहले ही इसे खत्म कर दो। उसे खत्म करने की मणी भी मैं तुम्हें देती हूँ। मुझे इस अंधेरे से निकालने के बाद तुम्हारे सामने एक दरवाजा खुलेगा। वही दरवाजा तुम्हें बेमतलबी तिलस्म से बाहर निकालेगा।“ उस दिन चकाचौंध करदेने वाली उस रौशनी के काले अंधेरे ने मुझे रौशनी दिखा दी।
इस चमक को तवज्जो देने वाले समाज में जहां यह कहा जाता हो की उसकी बेटी की शादी में इतना दहेज दिया गया और 32 तरह के पकवान बने थे। वाह वाह! बेचारे बाप की हालत खराब की जाती हो। ये समझना की सारी बातें बस एक तिलस्म भर हैं और ये तिलस्म इतना प्यारा लगने लगता है जबकि इसका अंदाज़ा भी है कि ये तिलस्म एक दिन खत्म हो जाएगा और उसका विजेता भी वही होगा जो उस तिलस्म के नीयमों की परवाह नहीं करेगा।
इस चमक दमक के बीच थोड़ी याद ताज़ा करते हैं। आपको याद होगा एक बड़े नामी अभिनेता ने अभी कुछ ही महीने पहले एक TV शो का संचालन करते हुये सादगी से शादी करने कि सलाह दी। बड़ी अच्छी सलाह लगी वहीं इस शो के करीब तीन दशक पहले भी कुछ लोगों ने सादगी से शादी करने की सलाह खुद सादगी से शादी करके दी। रस्मों रिवाज से ज़्यादा महत्व उन्होने आपसी विश्वास और प्यार को दिया। बैंड बाजा और बारात को त्याग समाज के खिलाफ तो नहीं पर समाज की खराबियों को बदलने का प्रयास किया। बड़ों के पूछने पर कि तुम ऐसा क्यों करना चाहते हो अपने तर्क भी दिये। इसका श्रेय बड़ों को भी जाता था कि उन्होने अपने बच्चों की बातें सुनी और समझा कि ये सारी बातें हवा में नहीं हो रही है। इसके पीछे सोची समझी विचारधारा है।  
मैं ये सोचती रही और देखती रही। मेरे आंखो के सामने धुंधलाहट सी आ गई शायद आंसूँ थे। तभी बारात आगे बढ़ी और मैं भी। उस रात मेरा दिल बड़े दिनों बाद फिर भारी लगा।  सारी रात मैं उसी चमकीले आवरण में रही। सोचती रही, क्या मेरे अंदर इतनी हिम्मत और ताकत है कि मैं उसे उसी अंधेरे में घुस कर बाहर नीकालने की कोशिश कर सकूँ। शायद नहीं। पर कोशिश करने में क्या हर्ज़ है। अपने दायरे में रहकर करना थोड़ा आसान हो जाएगा शायद।
तो मैं खुश हूँ कि मेरे हाथों की मेहंदी मेरी शादी कि नहीं। पर मुझे समझाती है कि सोच समझ कर ये कदम उठाना जब अगली बार खुद के लिए मेहंदी लगाना तो देख समझ लेना की तुम्हारा साथी दीये के ऊपर की रोशनी को तवज्जो देता या की उसके नीचे के अंधेरे को भी।

Wednesday, 2 November 2011

SP – 26, सारपास है ख़्वाहिश

करीब चार साल हो गए जब मैं trekking पर गई थी। दीदी के साथ पहली बार जा रही थी। यूथ हॉस्टल असोसिएशन ऑफ इंडिया एक ऐसा organization है जो बड़े उम्दा किस्म के treks निकालता है और यह वाला जिसमें हम जा रहे थे वो उनमे से एक था। हमे कुल्लू से होते हुये कसौल जाना था। रात भर के बस के सफर के बाद जिसमें कई बाद नींद टूटती है। हम हैरान परेशान कुल्लू के बस स्टैंड पर उतरे ।
“कसौल”! कसौल एक ऐसी जगह है जहां आपको अलग अलग देशों के इंसान नशे में झूमते हुये नज़र आएंगे ज़्यादातर जर्मनी और फ्रांस के। शिवा मामा, शिवा बाबा और न जाने इसी प्रकार के कितने ही “spiritual feeling” देने वाले अजीबोगरीब नाम के cafes आपको जहां तहां दिखाई देंगे जिनके अंदर आप बाहर से साफ साफ दम मारो दम के दृश्य देख सकते हैं। मेरे लिए यह बड़े ही चोंकाने वाले दृश्य थे। पर इन सबों से विपरीत YHAI का base camp शांत और सोम्य प्रतीत होता है।



पहले दिन पहुँचने पर आप बहुत कुछ देखते हैं, नए लोगों से मिलते हैं। देश भर के लोग वहाँ आते है। बंगलोरे, चेन्नई, गुजरात, महाराष्ट्र और न जाने कहाँ कहाँ के। इस कैंप की खास बात होती है कि आप बहुत से लोगों से मिलते हैं, दोस्त बनाते है, ऐसे दोस्त जो आपके साथ अगले 9 दिनो तक आपके उस अनोखे और साहसिक यात्रा के भागीदारी होते हैं।
सारपास करीब 14500 फीट की ऊंचाई पर है। ठंड के समय वहाँ जाना लगभग नामुमकिन है। हम गरमी में गए इसलिए गनीमत थी। सारपास लेक तक जाने में करीब 4 दिन लगते हैं। आप बस अपने पीठ पर अपना sack उठाए चलते जाते हैं और बस चलते ही जाते हैं।
हमारे समूह 40 लोगों का था। देश के अलग अलग भागों से, एक दूसरे से बातें करते जान पहचान बढाते कब पहला दिन बीता पता ही नहीं चला। हमारा 40 का group जैसे अली बाबा और चालिस चोर की कहानी जैसा था।
पहले दिन हमने बड़ा मज़ा किया। एक दूसरे से परिचय बढ़ाने के अलावा हमने rock climbing और rappelling भी की। हर व्यक्ति के उसके खासियत के अनुसार उसका nick name भी रखा जैसे deadly, marcky, बुलबुल इत्यादि। बड़े मज़े से हम कसौल घूमने गए और बड़े ही विचित्र नज़ारे देखे। वहाँ के जर्मन बेकरी से cake भी खाया।
तीसरे दिन हम बड़े जोश खरोश से अपने destiny की तरफ चल पड़े। इस उत्साह और थोड़े से डर के साथ की आगे क्या होने वाला है। मैंने दीदी से जिन्होने कई बार इतने लंबे और कठिन trek किए हैं, से सारपास के बारे में बहुत कुछ सुना था। सारपास सबसे खतरनाक trekking में से है ऐसा सुना था।
अगले दिन बस की छत पर चढ़ सैर करने में हमे बड़ा मज़ा आया। एक तरफ लंबा चौड़ा पहाड़ और दूसरी तरफ गहरी लंबी खाई। हमारे साथ उस बस के अलावा वहाँ की नदी भी साथ यात्रा करती दिख रही थी। जहां जहां सड़क मुड़ती नदी हमारे साथ हो लेती। कहती “चलो थोड़ी दूर तुम्हारा साथ देती हूँ”। बड़ा ही रोमांचक नज़ारा था। जैसे पहाड़ का पत्थर हमारे पास आता हम ज़ोर से अलग अलग आवाज़ निकाल एक दूसरे को चेताते। की भाई देखान सैर का मज़ा लेते हुये अपना सर ही मत तुड़वा लेना। नारे लगते, हो हल्ला करते और बस की छत की सैर का मज़ा ले रहे थे। एक जनाब ने अजीब सा नारा बनाया जिसे उतनी ही बुरी तरह नकार भी दिया गया। नारा था “रिम झिम – 26 सारपास है जाना”। अंत में बहुत से common नारों के साथ हमारा slogan था “ SP – 26 सारपास है ख़्वाहिश ”।
वैसे तो ये पूरा ट्रेक बड़ा खास था पर तीन घटनाएँ जो मुझे बेहद खास हैं और जिन्हे मैं भूल नहीं सकती यहाँ लिखती हूँ।
पहले ही दिन की बात है। हमने एक पहाड़ी के नीचे से अपनी Arabian nights की यात्रा शुरू की। नज़ारा देखने ही लायक था पर हमारा गाइड बिना इधर उधर देखे तेज़ी से मंज़िल की ओर बढ़ रहा था।, तो किसी भी जगह हम ज़्यादा देर तक रुक नज़ारों को निहार नहीं सकते थे। हमें आगे जाना ही पड़ता। शाम से पहले ही हम पहले camp पर पहुँच गए। हमारे साथ एक जनाब थे जो एक लंबा और बड़ा bag लिए हमारे साथ आए थे। रात हुई, camp fire के बाद वो बैग खुला तो उस अंधेरी रात में भी हमें आग की हल्की रौशनी में दिखा “अरे ये तो telescope है ” मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। अब तो बड़ा मज़ा आयेगा मैंने सोचा। उसने वो telescope fix किया। उस रात हमने न जाने कितने ही प्रकार के तारे और गृह बड़े पास से देखे। उसने व्यक्ति ने आसमान के सारे तारे हमारी झोली में जैसे डाल दिये हों और कहे की देखो कितने प्रकार और खूबियों के हैं ये। अलग अलग आकार के टिमटिमाते तारे बड़े ही धीर और गंभीर प्रतीत हो रहे थे उस दूरबीन से। खाली आंखो से आसमान को देखो, तो सारा आकाश जैसे तारों से टिमटिमाती हुई अलादीन की कहानी कि वो काली रात लग रही थी। मैंने सोचा यह नज़ारा तो मैंने अपने गाँव के प्रदूषण रहित घर से भी नहीं देखा है। चारों तरफ आकाश में तारे जैसे गजगजाए हुये थे। ऐसा लग रहा था जैसे ब्रह्माण्ड के सारे तारे उस आकाश में जहां तक हमारी नज़र जा रही थी, में सिमटना चाह हरे हों। उस रात हम बड़े देर से सोये। तारों के नीचे लेटे ठंड में ठिठुरते हुये आखिरकार हम अपने अपने tent में sleeping bags में धंस गए।
यहाँ चौथे दिन की बात बताती हूँ। करीब 10 की॰ मी॰ चले होंगे हम उस दिन। जैसे ही सारे दिन की सैर कर हम अपने camp पहुंचे। खाना खाया और बुरी तरह थके होने के कारण हम पहले की अपेक्षा जल्दी ही सो गए। आधी रात मुझे सपना आया (मुझे अच्छे से याद है) सपने में मेरा और दीदी का pet “तूफान” मेरा माथा अपनी ठंडी जीभ से चाट रहा था। फिर अचानक ऐसा लगा जैसे कोई छोटा सा पैर मेरे सर पर अपना पैर रख बड़े मज़े में उधम चौकड़ी मचा रहा हो। जब दूसरी बार ऐसा ही हुआ तो मेरी चीख निकाल गई। “आआआ” अपनी आधी नींद में





मैं ज़ोरों से चिल्लाई। मेरी बगल में सोई दीदी और बाकी के लोग भी उठ गए। उस छोटे से tent में हड़कंप मच गया। दीदी ने गुस्से में पूछा “क्या हुआ” मैंने कहा “पता नहीं, कुछ है जो मेरे सर पर अपना पैर रख रहा है”। टॉर्च जलाया तो देखा जनाब चूहे मेरे ही बैग पर बैठे मेरी ही टिफ़िन में पता नहीं क्या खोजते हुये मेरी तरफ चोंक कर देखने लगे। जनाब की आँखों में तो नहीं पर मेरी आँखों में उसने ज़रूर डर को देख लिया होगा। वे फुदकते फुदकते अपनी राह मस्तमौला चाल से नीचे उतरे और चल दिये। दीदी ने बड़े आराम से दुबारा सोते हुये कहा “ओह चूहा है, ज़रूर तुम्हारे टिफ़िन को देखने आया होगा”। मैंने सोचा “मेरे ही क्यों, किसी और के टिफ़िन में मुह मारे कमबख़्त ”। एक दूसरी लड़की ने आधी नींद में कहा “ सो जाओ, अपना सर sleeping bag के अंदर रख लेना”। हुंह, जैसे मेरा दम न घुट जाए उसमें। सोचते हुये मेरी पूरी रात वैसे ही टॉर्च जलाए बीती। रात भर जागी होने के कारण मैं सुबह जल्दी उठ गई। बाहर आई तो देखा कुछ दूर वहाँ के स्थानीय निवासी एक छोटी सी झोपड़ी बनाए आग ताप रहे थे। उनके पास मैं गई और बैठ गई। मैंने उनकी तरफ मुस्कुरा कर देखा और उन्होने मेरी तरफ। उन्होने चाय बनाई। इतनी मीठी की चीनी को भी मात दे जाए पर मैंने किसी तरह पी ही ली। उनसे बात करते मैंने उन्हे बड़ी ही उत्सुकता सेरात की घटना बताई। एक महिला जो वहीं बैठी चाय बना रही थी कहा “सोच कर चलिये की गणेश जी के चूहे आए थे आशीर्वाद ले कर, और आपके सर पर अपना आशीर्वाद दे कर चले गए”। मैं आवक उन्हे देखती रही। मेरी जान निकाल गई थी (या वैसा ही कुछ) और उन्हे आशीर्वाद सूझ रही है।
जैसे ही मैं चाय पी कर उठी उनमें से एक बूढ़े ने बड़े प्यार से आशीर्वाद देते हुये मुझे पाँच रु॰ दिये कहा मेरे पास बस यही देने को है आप आई और हमारे पास आ कर बैठी, अच्छा लगा।
मैंने न न कहते हुये उस पाँच के नोट को ले लिया। वह नोट अभी भी मेरे पास रखा है। मेरे पर्स में रखा जब भी मैं उसे खोलती हूँ एक नज़र उठा कर देख लेता है।
तीसरी और आखिरी घटना मुझे ही नहीं मेरे सभी साथियों की जान निकालने वाली है।
आठवें दिन हम सारपास lake के लिए निकले। यहाँ से इस जगह से बर्फ शुरू हो जाती है गनीमत थी, हम गर्मियों के मौसम में वहाँ पहुंचे । हमने चढ़ना शुरू किया आसमान साफ, सूरज की ताज़ा गरमा गरम किरणे सुबह की ठंड में बड़ी प्यारी लग रही थी। हम बड़े जोश के साथ आगे बढ़ रहे थे। जब बर्फ शुरू हुई हमने बड़ी मस्ती की। बर्फ के गोलों का युद्ध देखने लायक था। थोड़ी ही देर हुई थी की एक guide आया और जल्दी चलते को कहने लगा। हमें समझ नहीं आया पर हामी भर हम भी साथ हो लिए अब बर्फ के गोलों के कारण हमारे दस्तानों में भी नमी आने लगी थी।
आगे बढ़े तो बर्फ से ढका सपाट मैदान सामने। मैंने सोचा “हमें इसपर जाना है , इसका तो कहीं अंत ही नहीं दिखता ” मन में अचानक एक हल्का सा डर पनपा। पर मन को समझा मैं आगे बढ़ी। मेरे सामने 1 – 2 लोग ही थे।थोड़ा आगे चले तो एक संकरी बर्फ ही की पगडंडी दिखाई दी। एक तरफ बर्फ ही का पहाड़ और दूसरी ओर बर्फ ही की खाई।  पीछे देखना मुमकिन नहीं दिख रहा था। उस सँकरे रास्ते पर पीछे मुड़ना मतलब मेहनत का काम जान पड़ता था। उस ढलान पर हमें एक guide ने surfing भी कर दिखाई फर्क सिर्फ इतना था की surfing boat नदारद थी। हमें एक जगह ज़्यादा देर पैर रखने से मना किया गया था इस कारण लगातार चलना पड़ रहा था। जल्दी चलने को कह वो अपनी चाल आगे बढ़ गया। पाँच मिनट भी नहीं हुये थे की आकाश में जिन्न की तरह मुह बाए हमारी तरफ काला घना बादल आता दिखाई दिया।  मेरे साथ 7 – 8 लोगों का ग्रुप आगे बढ़ रहा था। बाकी के लोग पीछे छूटे हुये थे। ठंड के मारे पहले ही हम जमें जा रहे थे, अब तो चेहरा भी जमने लगा था। तभी पीछे से आवाज़ आई । सुन हम चौंक पड़े पीछे मुड कर देखने लगे। “आआआ ई ई ई ई” Spidy (सागर) बर्फ की ढलान पर तेज़ी से गिरता दिखा। करीब तीस फीट दूर ही एक खाई देख हमारी आवाज़ अटक गई। डर से हम बस देखते ही रह गए उसे खाई की तरफ गिरते हुये।  गनीमत थी की एक गाइड super hero  की तरह कूदता फाँदता वहाँ गया और उसे कोलार से पकड़ खींच लिया। सागर के माँ पिता की तो पता नहीं क्या हालत थी। वो बस देखते ही रहे। पाँच मिनट ही बीता होगा की एक और आवाज़ आई आ आ आ इस बार कोई और था हमने देखने की ज़हमत नहीं उठाई बस आगे बढ़ते गए। बाद में पता चला 2 – 3 और लोगों ने sliding का मज़ा चखा था। खैर ये उन guides के लिए रोज़ का काम था।
हम आगे बढ़े और चलते ही चले गए। रास्ता जैसे खतम ही नहीं हो रहा था। आगे देखो तो रूई सा सफ़ेद बर्फ दिखता और हर एक कदम के साथ डर रहता। थोड़ी देर में देखा जो हमारे साथ के गाइड थे वो भी नदारद। अपनी नज़रे इधर उधर कर हमारे super hero को ढूंदते हुये अचानक सामने देखा तो एक घुमाव के बाद दूसरी तरफ का रास्ता बंद , सोचा “ये कैसे हो गया, ये संभव नहीं कुछ गड़बड़ है” लगभग दस फीट की एक steep चढ़ाई और उसपर से एक ओर खाई। न जाने वह देख मैं शांत हो गई मन शून्य, खाली,  बस मैं देखती रही। मन में एक डर आया “अब कुछ नहीं हो सकता, मैं ये नहीं कर सकती, अगर मैंने कोशिश की तो मैं ज़िंदा नहीं बचूँगी, खाई में गिर पड़ूँगी । पता नहीं कमबख्त इस super hero को भी अभी ही गायब होना था”। मेरे पीछे के लड़के एकदम शांत हो बस देखते रहे किसी के बोलने की न हिम्मत हुई और न ताकत ही बची थी। नज़रों से तलाशा ऊपर चढ़ने के लिए न कोई टहनी, न कोई पत्थर ही दिखाई दिया जिसे पकड़ मैं ऊपर चढ़ सकूँ। मन शांत होने के साथ हवा और तेज़ हो गई जैसे चेता रही हो “तिना ऊपर न चढ़ना ”। पर वहाँ रुकना संभव न था हमारे पैरों के नीचे की बर्फ पिघलती जा रही थी और अभी भी हमारे गाइड वहाँ से गायब थे। ऊपर चढ़ना ही था नहीं तो वैसे भी हम एक एक कर गिरते , पीछे से आवाज़ आई टीना कोशिश करो हो जाएगा।
मैंने अपनी हिम्मत समेटी और यह सोच जो होगा देखा जाएगा बिना खाई की तफ़र देखे बर्फ ही को पकड़ ऊपर की तरफ खुद को धकेला, और यह क्या अगले ही क्षण मैं ऊपर थी येयेपीपी मेरी खुशी का ठिकाना न था। पहली बार मैंने अपनी हिम्मत की परीक्षा ली थी। पहली बार मुझे पता चला था की मैं खुद को कहाँ तक ले जा सकती हूँ। शायद ज़िंदगी की ऐसी ही घटनाओं से आप खुद को परखते है, खुद की अनगिनत बातों को खोज निकालते हैं जो शायद खुद को ही पता नहीं रहती।